top of page
WhatsApp Image 2025-11-29 at 20.26.03_ead60480.png

समस्या विवरण

समस्याएं

! 25 साल बिना स्थायी राजधानी के!

वर्ष 2000 में उत्तराखंड का गठन इस वादे के साथ हुआ था कि इसकी राजधानी यहां के पहाड़ी समुदायों की आकांक्षाओं को प्रतिबिंबित करेगी। लेकिन इसके बजाय, देहरादून एक अस्थायी शीतकालीन राजधानी और गैरसैंण एक प्रतीकात्मक ग्रीष्मकालीन राजधानी बन गई, और घोषणाओं से परे कुछ भी प्रगति नहीं हुई।

! विकास केवल मैदानी इलाकों में ही केंद्रित है !

देहरादून में सरकारी दफ्तर, विश्वविद्यालय, सड़कें, नौकरियां, अस्पताल, लगभग सब कुछ बन चुका है। लेकिन गढ़वाल से कुमाऊं तक की पहाड़ियां अभी भी अविकसित हैं।

पहाड़ी गांवों से बड़े पैमाने पर पलायन!

शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, सड़कें और रोजगार जैसी बुनियादी सुविधाओं की कमी परिवारों को अपने पैतृक गांवों को छोड़ने के लिए मजबूर करती है। हजारों गांव अब वीरान पड़े हैं।

यह पलायन समुदायों को तोड़ता है, संस्कृति को कमजोर करता है और पहाड़ों को खाली कर देता है।

देहरादून अपनी मनुष्य और वहन क्षमता से अधिक जा चुका है!

भीड़भाड़, प्रदूषण, यातायात जाम, पानी की कमी — देहरादून इन समस्याओं से जूझ रहा है। इन सभी समस्याओं को एक ही शहर में केंद्रित रखना न तो व्यावहारिक है और न ही भविष्य के लिए टिकाऊ।

असंतुलित शासन व्यवस्था !

राजधानी का अधिकांश पहाड़ी जिलों से दूर स्थित होना इस प्रकार है:

  • नागरिकों के लिए लंबी यात्रा

  • शासन के लिए उच्च लागत

  • दूरस्थ क्षेत्रों से कम भागीदारी

  • स्थानीय मुद्दों को नजरअंदाज किया गया

#iforgairsain

इस आंदोलन में शामिल हों

+91 82670 19301

देहरादून, उत्तराखंड 248001, भारत

  • Youtube
  • Facebook
  • Instagram
bottom of page